"नाम करेगा रौशन, जग में मेरा राजदुलारा..."
पहले तो मैंने इधर-उधर देखा कि ये आवाज़ आ कहां से रही है। अब जमाना तो डिजिटल हो गया है – और आज की नौजवान पीढ़ी तो EDM, रैप और बेस वाली बीट्स में ही उलझी हुई है। पर वो धुन? सीधा दिल को छू गई।
थोड़ी खोजबीन के बाद देखा – सड़क किनारे एक ढाबे वाले ने मोबाइल में FM चलाया हुआ था। हां, वो रेडियो नहीं था, लेकिन आवाज़ वही थी – वही पुरानी मीठी आवाज़, जो कानों में रस घोल देती है।
उस आवाज़ ने जैसे एक पिटारा खोल दिया – बचपन की ढेरों यादें लौट आईं। मुझे याद आया, मेरे ताया जी को शादी में एक बड़ा सा रेडियो मिला था, जो आज भी हमारे पुराने घर के किसी कोने में धूल फांक रहा होगा। वो दौर ऐसा था जब रेडियो टीवी जितने बड़े हुआ करते थे। फिर धीरे-धीरे छोटे हुए, और आज मोबाइल में समा गए हैं।
रेडियो का जमाना ही कुछ और था। चाय की दुकान, नाई की गुमटी, डॉक्टर की क्लिनिक – हर जगह रेडियो बजा करता था। गानों की समझ भले न हो, लेकिन वो धुनें दिल को भाती थीं।
मुझे याद है, पहले रेडियो में बड़ी-बड़ी बैटरियां लगती थीं। फिर छोटे रेडियो आए और अब मोबाइल में ही रेडियो आ गया। मेरे पिताजी के पास एक फोन है जिसमें FM चलता है। एक बार सिखाया, अब हर वक्त पुराने गानों की मधुर आवाज़ घर में गूंजती रहती है।
बचपन में रेडियो के डायल को घुमाते हुए हम कभी नहीं समझ पाए थे कि सुई और पैमाने का क्या काम है। बस आवाज़ ठीक आए, वहीं रोक देते थे। और जब आवाज़ नहीं आती थी, तो झुंझलाकर रेडियो को थपथपाते थे।
आज जब कोई पुराने गाने बजाता है, तो दिल से सलाम करने का मन करता है – सलाम उस एहसास को, उस वक्त को, और उन धुनों को, जो अब गुमसुम सी हो गई हैं... मगर हमारी यादों में आज भी ज़िंदा हैं।

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